पहाड़ का मतलब नदी , झरने , शांति है , पहाड़ का मतलब लग्जरी होटलों की चारदीवारी नही ...

पहाड़ का मतलब नदी , झरने , शांति है , पहाड़ का मतलब लग्जरी होटलों की चारदीवारी नही ...

समय जैसे पंख लगाया हो अपने , एक महीना बीत गया आज , सफर हमसफ़र के संग की वो यात्रा आज के ही दिन शुरू हुई थी , इस सफ़र की यादें इतना कचोटेंगी ये ख्याल नही था आज से एक महीना पहले तक ....

क्रमशः से आगे 

मेरे लिए पहाड़ों पर जाने का मतलब है , ठहर जाना , नदियों की कल कल सुनना , झरनों में झूमना , देवदारों की आड़ लेना , बुग्यालों में भटकना न कि ईंट सीमेंट से बने स्वीमिंग पूल वाले किसी रिजॉर्ट में हो हल्ले के बीच रहना । जावेद अख्तर साहब ने लिखा था कि मुझे पामाल रस्तों का सफर अच्छा नही लगता , जिधर सब जाते हैं उधर अच्छा नही लगता । ठीक ऐसे ही ...

कैंची धाम और उसके पहले की भीड़ भाड़ , गाड़ियों की मच मच , चिल्ल पों से आगे बढ़ते हुए हम सब , हम सब यानि मैं , पूनम और हमारे हर्ष , विष्णु । शालू , राहुल जी और उनके रेशू , कान्हा । हमारे चिर युवा सारस्वत जी भाईसाहब ,उनकी श्रद्धा जी और उनके तनिष्क , पंखुड़ी और फास्ट एंड फ्यूरियस अनूप । जैसे जैसे आगे बढ़े हम हमे एक बेहतरीन चौड़ी सड़क मिलती गयी जो जाती थी अल्मोड़ा तक । नदी के किनारे किनारे चलती हुई एक शानदार सड़क । अल्मोड़ा शहर के अंदर घुसने से पहले और अल्मोड़ा से बाहर निकलने के बाद हमको ट्रैफिक ना के बराबर मिला , मानो नैनीताल तक ही आते हैं और जाम हो जाते हैं छुट्टी मनाने वाले लोग , मेरे शब्दों में वो टूरिस्ट होते हैं और हम घुमक्कड़ों की श्रेणी में  आ गए थे अब । 

अल्मोड़ा से आगे निकलकर हम बेरीनाग वाली रोड पर बढ़ चुके थे , रास्ते के देवदार , चीड़ , जंगल , शांत और सुरम्य रास्ते हमे बार बार आगे बढ़ते रहने से रोक रहे रहे , बार बार ठहर जाने को मजबूर कर रहे थे । गोलू देवता के मंदिर से आगे एक बेहद खूबसूरत देवदार का बुग्याल टाइप जंगल था जहां खुद ब खुद ब्रेक लग जाते हैं घुमक्कड़ों के , फ़ोटोग्राफी के शौकीनों के , अगर उधर जाइयेगा तो ठहरियेगा जरूर ऐसी मेरी राय है सभी ऊपर लिखे लक्षण वालों को । 

पतले पतले , सांप जैसे , सुनसान से रास्तों को , जागेश्वर जाने वाले रास्ते को छोड़कर बेरीनाग के रास्ते पर था हमारा अगला पड़ाव जिसे काफी खोजबीन के बाद जिसमे मैने अपने नदी , झरने , जंगल और पहाड़ के कॉम्बिनेशन को पाया वो था होबो हट्स, लिंगुरता गांव । नदी के किनारे , जंगल के बीच , करीब 5 एकड़ की एक नयनाभिराम जगह जिसे संचालित करते हैं दिल्ली और जर्मनी को त्यागकर जंगल मे बसने आये अश्वनी राजपूत जी और लिंगुरता गांव के कुछ साथी , जब मैंने अश्वनी जी को बताया कि यहां के बारे में Swarna Sharad Rao जी ने भी बताया था तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा  Swarna , very sweet girl she is , too adorble  .

अगर आपको अपनी सुबह चिड़ियों की चहचहाट से शुरू करनी है , अगर आप अपनी सुबह और शाम नदी के किनारे , नदी की धार में पैर डुबोकर गुजारना चाहते हैं , अगर परम् शुद्ध , बिना किसी रासायनिक तत्व के भोजन चाहते हैं , अगर आप अपनी शाम और रात चूल्हे पर पकती रोटियों , संगीत की धुनों , हमसफ़र संग थिरकने के साथ जीना चाहते हैं , अगर नदी के किनारे पत्थरों और लकड़ी से बने आसनों पर बैठकर अपना लिटिल लिटिल लार्ज लार्ज कार्यक्रम करना चाहते हैं सुकून से (सभ्यता से )तो आप लिंगुराता की तरफ बढिये , ठहरिए और थम जाने दीजिए जीवन को । ओबाइल , मोबाइल , चिंता , फ़िक्र सब पीछे छोड़ दीजिए और महसूस करिये बस रमणीयता को , सुरमयता को ......

आज की आखिर में जलील मानिकपुरी की ये पंक्तियां और सफर हमसफ़र के संग का आखिरी पड़ाव के संग जल्द आने का वादा ...

दिलचस्प हो गई तिरे चलने से रहगुज़र 

उठ उठ के गर्द-ए-राह लिपटती है राह से ।।

क्रमशः 

(Abhinav Dwivedi) 


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